सैकड़ा भर मवेशियों की मौत का गुनाहगार कौन --?

 




  सैकड़ा भर मवेशियों की मौत का गुनाहगार कौन --?

 

मुख्यालय में नहीं रहते पशु चिकित्सक और जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी।

 

 

विराट वसुंधरा/ रामलखन गुप्त 

रीवा। रीवा जिले के त्योंथर में हुई एक सैकड़ा  पशुओं  की मौत से रीवा जिले का प्रशासन ही नहीं मानवता पर भी सवाल उठने लगा है जिस प्रकार से आम जनता का तर्क है कि आवारा मवेशियों द्वारा फसलों को नष्ट किए जाने की वजह से ग्रामीणों ने ऐसा कदम उठाया, कि सभी आवारा मवेशियों को बड़ी संख्या में त्योंथर के बसहट गांव में बाडा़ बनाकर बेंड़ दिया गया था किसानों के अपने तर्क यह भी है कि दूसरों के मवेशियों की व्यवस्था वो क्यों करें और पंचायत से की गई व्यवस्था पर मानवीय संवेदनाएं भी मरी हुई समझ में आ रही हैं मौतें पहले भी होती रहीं हैं जिसे ग्रामीण लोग छिपाए रहते थे बसहट गांव के तालाब की मेढ़ पर गांव वालों ने बाड़ा बनाकर मवेशियों को रखा था। यहां पर पहले भी बड़ी संख्या में मवेशियों की मौत होती रही है। मृत मवेशियों को कुत्ते नोच-नोच कर खाते रहे और गांव वालों ने इसलिए कुत्तों को नहीं भगाया कि इन मवेशियों को दफनाना नहीं पड़े। पशु चिकित्सकों एवं रेस्क्यू टीम में लगे लोगों ने बताया कि करीब ३० से अधिक कंकाल और जानवरों के शव तालाब की मेढ़ से बरामद किए गए हैं। इस घटना ने शासन प्रशासन आम आदमी और ग्राम पंचायत की  व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सौ से अधिक मवेशियों को बाड़ों से मृत हालत में निकाला गया है, गांव में जिस प्रकार से मवेशियों को दलदल रूपी बाड़े  में बंद करके रखा गया था और खाने में भूषा-चारा और पानी नहीं दिया जा रहा था जिसके कारण सैकड़ा भर मवेशी काल के गाल में समा गए।

 

मुख्यालय में नहीं रहते पशु चिकित्सक --

रीवा में पिछले माह पूर्व कलेक्टर ओ पी श्रीवास्तव ने निर्देश जारी किया था कि सभी कर्मचारी और अधिकारी अपने निर्धारित मुख्यालय में स्थाई रूप से रहें लेकिन उनके आदेश उनके स्थानांतरण होने के बाद अमल में नहीं आए अधिकांश अधिकारी कर्मचारी मुख्यालय में ना रह कर रीवा शहर या अन्य जगह से अपनी आमद देते हैं अब सवाल यह उठता है कि सैकड़ों पशुओं की मौत के बाद लाखों रुपए सरकार से  वेतन लेने वाले पशु चिकित्सको पर सवाल उठना जरूरी है वो इसलिए कि पशु चिकित्सा अधिकारी वेतन किस बात की लेते हैं जब वो इलाहाबाद सतना और रीवा से कभी- कभी अप डाउन करते हैं कागज़ों पर ड्यूटी कर लाखों का वेतन ले रहे हैं पता चला है कि रीवा जिले के 3-4 पशु चिकित्सा अधिकारियों के अलावा संयुक्त संचालक पशु चिकित्सा विभाग रीवा की छत्रछाया में जिला मुख्यालय से बाहर कार्यरत पशु चिकित्सा अधिकारी अपने मुख्यालय में नहीं रहते चाकघाट में पदस्थ डॉक्टर ए पी सिंह इलाहाबाद में रहते हैं कभी-कभार विभागीय मीटिंग या अपने मुख्यालय में आमद देते हैं वह भी सीधे इलाहाबाद से चलकर त्योंथर तहसील के ही डॉक्टर मनीष कुशवाहा सतना से अप डाउन करते हैं डॉक्टर आरपी गौतम रीवा शहर से कभी-कभार अप डाउन करते हैं जबकि हनुमाना मऊगंज और नईगढ़ी के पीके गुप्ता जेएल साकेत और पीके मिश्रा त्योथर अपने निर्धारित मुख्यालय पर ही रहते हैं इसके अलावा यदि पशु चिकित्सा विभाग के डॉक्टरों की विभाग इनके मोबाइल नेटवर्क लोकेशन से जांच करे तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए बाहर हाल जानवरों की मौत के बाद पशु चिकित्सकों की टीम ने परीक्षण किया तो पता चला है कि इनकी मौतें दम घुटने और भूख-प्यास की वजह से हुई हैं। बसहट में दूधनाथ भुर्तिया के मकान के पास करीब तीस वर्ष पुराने कांजी हाउस में करीब दो सप्ताह पहले से जानवरों को लाया जा रहा था। यहां पर करीब डेढ़ सौ से अधिक संख्या में मवेशी भरे गए थे। उसमें स्थान इतना कम था कि इन मवेशियों को खड़े होने के अलावा स्थान नहीं था। वहीं बाड़े के भीतर मौतें होती रहीं, यह पता होने के बाद भी गांव वालों ने इस पर पर्दा डालने का प्रयास किया। प्रशासन का स्थानीय अमला गांव में कभी नहीं जाता, जिसकी वजह से उसे भी इस तरह के कार्यों की भनक नहीं थी। 

 

त्योंथर में सैकड़ा भर मवेशियों की मौत का गुनाहगार आखिर कौन --?

 दोषियों पर कैसे होगी कार्यवाही पुलिस के त्योंथर एसडीओपी एवं अन्य अधिकारी जांच के लिए मौके पर पहुंचे मौका मुआयना किया अब जांच और विवेचना की बारी है प्रथम दृष्टया आइपीसी एवं पशु क्रूरता अधिनियम की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया है। मामले में १७ लोग नामजद हैं, संख्या और बढ़ेगी। साथ ही सरकारी कर्मचारियों की भूमिका का भी परीक्षण किया जा रहा है। मवेशियों को बाड़े में इस तरह रखा जा रहा था, जानते हुए जिन्होंने सूचना नहीं दी उनसे भी पूछताछ कर रही हैं सीधे तौर पर किसी व्यक्ति या विभाग को दोषी मान लेना भी उचित नहीं है लेकिन यह भी सच है कि पशु चिकित्सा विभाग ग्राम पंचायत के साथ कहीं ना कहीं जनता भी बराबर दोषी है लेकिन कानून भावनाओं से नहीं सबूतों और गवाहों से चलता है इस गंभीर हादसे मै किसी न किसी कर्मचारी या व्यक्ति को दोषी जरूर बनाया जाएगा जबकि दर्जनभर जिम्मेदार अधिकारी अवकाश के बहाने अपने आप को बचाते फिर रहे हैं वहीं रघुनाथ प्रसाद भुर्तिया, सरपंच- गांव के प्रमुख व्यक्ति हैं, मवेशियों की समस्या से प्रशासन को अवगत कराना पहला दायित्व है। मवेशियों को मरने के लिए बंद रखा गया है, यह जानते हुए भी खामोश रहे।

शिवनारायण तिवारी, सचिव- लंबे समय से ग्राम पंचायत में नहीं आते, लोगों से बताया है कि गंभीर बीमारी से पीडि़त हैं। गांव के लोगों ने फोन पर सूचना देनी चाही लेकिन फोन ही रिसीव नहीं किया। अवकाश पर होने की जानकारी गांव वालों को भिजवाते रहे।

अवधेश मिश्रा, पटवारी- गांव के पटवारी हैं, किसी भी तरह की सूचना एसडीएम और कलेक्टर तक पहुंचाने का माध्यम थे। ग्रामीणों ने कहा है कि जब वह गांव आएं तब तो जानकारी दें प्रदीप तिवारी, ग्राम रोजगार सहायक- पंचायत सचिव की अनुपस्थिति में उसके कार्य भी करते हैं। गांव वालों ने जानकारी दी, इसके बावजूद किसी को नहीं बताया। अनिल शुक्ला, कृषि विस्तार अधिकारी- गांव में किसानों को उन्नत तकनीक की सूचना देने के साथ किसानों की अन्य समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है। इन्होंने भी अपनी भूमिका नहीं निभाई। डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह, पशु चिकित्सक- इनकी जिम्मेदारी है कि जानवरों के स्वास्थ्य पर नजर रखें, बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं तो विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को बुलाकर जानवरों को बचाने का प्रयास करें। रायपुर सोनौरी में मुख्यालय है लेकिन आसपास के गांवों तक नहीं जाते अंकित मौर्या, प्रभारी तहसीलदार- सरकार आपके द्वार योजना के तहत अधिकारियों को गांव में जाकर लोगों से संवाद करना है। ये प्रभारी तहसीलदार हैं लेकिन गांव के लोगों से कोई संपर्क नहीं बना पाए।

 

नहीं कर पाए मामला रफादफा --

 बसहट बस्ती से थोड़ी दूर पर स्थित तालाब के किनारे बनाए गए अवैध बाड़े में मवेशियों को बंद करके रखा जाता था और जब उनकी दो दो चार चार करके मौत होती थी तो उसके चमड़े निकालने का काम किया जाता था और उनके कंकाल वहीं फेंक दिए जाते थे ।इस प्रकार अवैध बाडे में मरने वाले मवेशियों के चमड़े से भी व्यापार किया जाता रहा किंतु इस बार एक साथ  इतने मवेशियों के मर जाने के कारण मामला तूल पकड़ा। घटनास्थल पर जब हमारे संवाददाता पहुंचे तो उस समय तक प्रशासन के लोग तालाब के पास है बने अवैध बड़े में मारे गए मवेशियों को जेसीबी से गड्ढा खोदकर दफना दिया था तथा गांव के समीप बने सरकारी कांजी हाउस जिसमें दलदल कीचड़ मैं दवे मृत्यु मवेशियों को भी  दफनाने का प्रयास किया जा रहा था किंतु क्षेत्रीय विधायक श्याम लाल द्विवेदी, डॉ रोहित तिवारी ,ललित मिश्रा ,शिवानंद सहित हमारे प्रतिनिधि व अध्यक्ष सामाजिक कार्यकर्ता के पहुंच जाने पर मामले को रफा दफा करने से रोक दिया गया । जब इन लोगों के द्वारा मांग की गई कि मृत पशुओं की पोस्टमार्टम कराई जाए उसके पश्चात उन्हें दफनाया जाए ऐसी स्थिति में 30 फिर लंबे एवं 30 फीट चौड़े  30 कांजी हाउस में भारी संख्या में मरे मवेशियों के बीच 6 गोवंश जीवित पाई गई जिन्हें भारी मशक्कत के बाद बाहर निकाला गया ।प्रशासनिक  स्तर पर 76 गोवंश मारे जाने की खबर है किंतु जिस समय जीवित मवेशियों को बंद किया गया था उस समय हल्का पटवारी ,आर आई ,पुलिस विभाग के बीट प्रभारी ,सरपंच स पंचायत सचिव ,चिकित्सा विभाग के लोग, ग्राम सेवक ग्राम सहायक किसी ने भी अपने दायित्व के प्रति जिम्मेदारी नहीं निभाई ।यदि जरा सा भी मानवता और अपने कर्तव्य के प्रति जागरूकता होती एक साथ इतनी संख्या में गोवंश की क्रूरतम मृत्यु ना होती ।यदि पशु क्रूरता का अपराध कायम होता है तो इसके जिम्मेदार और लापरवाह अधिकारियों कर्मचारियों को भी दोषी मानकर उनके भी विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए।




 


 

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